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उद्यानिकी में नवाचार, जिले में हो रही अनानास की खेती

Publish Date: | Tue, 15 Sep 2020 04:16 AM (IST)

छिंदवाड़ा। सौंसर क्षेत्र की पहचान संतरा से है, तो खेती में जिले मक्का एवं संतरा आदि फसलों की पारंपरिक खेती के बाद अब जिले में अनानास की खेती भी सफलतापूर्वक की जा सकेगी। विकासखंड तामिया में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के तहत दूसरा कृषि विज्ञान केंद्र, देलाखारी में खोला गया है। जिसके फार्म में अनानास के 6 हजार पौधों का रोपण किया जा चुका है। प्रो. पी. के. बिसेन, कुलपति, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा टीम गठित की गई, जिसमें डॉ. ओम गुप्ता, संचालक विस्तार सेवाएं, समेत कई कृषि वैज्ञानिकों ने पाया कि देलाखारी, तामिया की जलवायु उपयुक्त है। इसी तारतम्य में विश्वविद्यालय के उद्यानिकी वैज्ञानिकों का दल डॉ. दिनकर शर्मा के नेतृत्व में केंद्रीय उद्यानिकी संस्थान, दीमापुर, नागालैंड के दौरे पर गया था, जहां बहुतायत से अनानास की खेती की जाती है और सबसे गुणवत्तापूर्ण अनानास का उत्पादन किया जाता है।

ऐसा होता है अनानास

अनानास का पौधा झाड़ीनुमा होता है, जो लगभग 1 मीटर तक ऊंचा होता है। इसका तना छोटा होता है, और इसकी गांठे काफी ज्यादा मजबूत भी होती है, अनानास का तना प्रायः पत्तियों से भरा हुआ होता है, और यह पूरी तरह से गठीला होता है। भूमि के समीप स्थित गुप्त तने से सूर्य की किरणों की तरह चारों ओर पत्तियां निकलती है। पत्तियां कांटेदार लंबी और कम चौड़ी फीते के सामान होती है। इसी स्थान से लगभग एक से डेढ़ वर्ष बाद डंठल निकलता है. जिसमे फूल लगता है, और यही आगे चलकर ऊपर बढ़कर फल विकसित करता है। अनानास का फल अत्यंन्त ही स्वादिष्ट होता है। इसमें ब्रोमिलीन, नामक एंजाइम होता है, जो शरीर के पाचन संस्थान में सहायक होता है। यह कईं तरह के पोषक तत्वों से भरा हुआ फल है, जो शरीर के अंदर मौजूद कईं तरह के विष को बाहर निकालने का कार्य करता है। साथ ही ये उच्च एंटीआक्सीडेंट का स्रोत है। पित्त विकारों में विशेष रूप से और पीलिया में यह काफी फायदेमंद है। एक गिलास जूस के सेवन से दिन भर के लिए आवश्यक मैग्नीशियम के 75 प्रतिशत की पूर्ति होती है।

इनका कहना है

देलाखारी, तामिया की जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र के फार्म में लगभग 15सौ वर्ग मीटर क्षेत्र में दोहरी लाइन पद्धति द्वारा अनानास की 6 हजार स्लिप्स को प्रयोग के तौर पर लगाया गया है। जिसके अभी तक के प्राप्त आंकड़ों के आधार पर प्रयोग सफल होता दिखाई दे रहा है। इसके फल 15 से 18 महीनो में परिपक्व होते हैं।

डॉ. आर. के. झाड़े, प्रभारी कृषि विज्ञान केंद्र, देलाखारी

भविष्य में जिले के किसानों को अनानास के व्यावसायिक उत्पादन के लिए केंद्र से पौधे उपलब्ध कराए जा सकेंगे। इसकी तैयारी भी कर ली गई है, जिससे जिले के किसान लाभांवित होंगे एवं आर्थिक रूप से सम्पन्ना होंगे।

डॉ. एस. डी. सावरकर, प्रमुख वैज्ञानिक (मृदा विज्ञान), कृषि विज्ञान केंद्र, छिंदवाड़ा

भविष्य में हमारा प्रयास रहेगा कि मध्यप्रदेश के अन्य कृषि विज्ञान केंद्रों में भी अनानास की प्रायोगिक रूप से खेती की शुरुआत की जाए।

डॉ. ओम गुप्ता, निदेशक, संचालनालय विस्तार सेवाएं, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर

Posted By: Nai Dunia News Network

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