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नर्मदा मां की गोद में चिर निद्रा में चले गए अमृतलाल वेगड जी

कलकल बहती, कभी पहाडों से जूझती तो कभी मैदानों में शांत बहती नर्मदा, इसकी परिक्रमा करने वाले यात्री, इसके आसपास की संस्कृति, बोलियां, जातियां, व्यंजन, जीवन, संघर्ष और नर्मदा का सौंदर्य ये सब आंखों के सामने नहीं आता यदि वेगड जी नहीं होते। साठ की उम्र में नर्मदा की परिक्रमा के लिए निकलने वाले जबलपुर निवासी अमृतलाल वेगड ने नर्मदा के इस पथ पर बहती हर उस चीज को अपने चित्रों, शब्दों से संभालकर कागजों में रखा जो अब तक अनछुआ था।

नर्मदा के इस यात्री ने छह जुलाई को अपनी अंतिम सांसे ली। अमृतलाल वेगड मेरे लिए अनजाने ही रहते यदि जुन्नारदेव कालेज के लाईब्रेरियन कवि गोपेश वाजपेयी मुझे अमृतस्य नर्मदा नहीं देते। महादेव मेले की यात्राओं के मेरे कवरेज को पढने के बाद उन्होंने मुझे अमृतस्य नर्मदा दी थी।

इसके बाद सौंदर्य की नदी नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा ने अमृतलाल वेगड के शब्दों के सोंदर्य, बात कहने की कला, नए तरह की उपमाओं और हर छोटी बात में लिखने के लिए बडी बात खोजने की उनकी खूबी को जानने का मौका दिया। नर्मदा मेरे लिए एक पवित्र नदी भर थी। सिर्फ इतना जानता था खेतों और कंठो की प्यास बुझाने के कारण इसे मां का दर्जा दिया गया था।

एक मां क्या करती है, क्या सहती है और कैसे जीवन देती है यह अमृतलाल वेगड जी की लेखनी ने स्पष्ट किया। ढलती उम्र में वेगड जी ने नर्मदा के सौंदर्य की यात्रा की। वे कहते भी थे कि ये धार्मिक नहीं सौंदर्य यात्रा है। नर्मदा परिक्रमा की धार्मिक यात्रा को उन्होंने सौंदर्य यात्रा बना दिया। एक ऐसी यात्रा जिसके हर अक्षर, हर शब्द, हर वाक्य से नदी उसके सौंदर्य, उसके जीवन और उसकी संस्कृति में खुद को तरबतर कर सकते थे।

अमृतलाल वेगड जी शांतीनिकेतन के विद्यार्थी और एक कुशल चित्रकार थे।

नर्मदा के इस लेखक में कई खूबियां थी। शांतीनिकेतन का यह विद्यार्थी एक कुशल चित्रकार था। शब्दों का सौंदर्य उनकी लेखनी से टपकता था। अपनी पुस्तक में उन्होंने कहा था कि जब लोग चित्रकार मानने से इंकार कर देते है तो मै लिखने लगता हूं और जब लेखक मानने से इंकार कर देते है तो चित्रकार बन जाता हूं। उन्होंने लिखा था कि उन जैसे साधारण व्यक्तित्व को शायद नर्मदा ने इसी लिए चुना था। लेकिन मेरा सोचना है कि नर्मदा मैया को इस साधारण व्यक्ति के असाधारण व्यक्तित्व की पहचान थी। न तो वेगड़ जी नर्मदा की जगह दूसरी नदी चुन सकते थे न नर्मदा मैया वेगड़ जी की जगह किसी और को चुन सकती थी। प्रख्यात लेखक निर्मल वर्मा ने भी कहा था क्या हम नर्मदा को वेगड़ जी से और वेगड़ जी को नर्मदा से अलग कर देख सकते है।

वेगड जी क्या थे उन्हें चंद पंक्तियों से व्यक्त कर पाना असंभव है। लेकिन ये वेगड जी के ही बस की बात थी कि 1312 किलोमीटर लंबी नदी को 2600 किलोमीटर की पदयात्रा कर उन्होंने कागज पर उकेर दिया।

वेगड जी कहते थे चित्रकार या लेखक होने का दावा उनका नहीं रहा। वे खुद को नर्मदा का संवाददाता कहलाना पसंद करते थे। वे खुद को  नर्मदा सौंदर्य का सांस्कृतिक संवाददाता कहते थे। वो भी इसलिए कि  इस पद से उन्हें हटाना जरा मुश्किल होगा। इस पद पर तो वे आजीवन बने रहेंगे। शायद मरणोपरांत भी। खुद को वे नर्मदा को अर्जुन और एकलव्य कहते थे।

नर्मदा की उन्होंने सेवा की लेकिन एक लेखक और एक चित्रकार के रूप में

आज नर्मदा के इस चितेरे ने अपनी अंतिम सांसे ली। अपनी किताब अमृतस्य नर्मदा में उन्होंने लिखा है कि नर्मदा जब कमंडल में आती है तो नर्मदा नहीं रहती। वह नर्मदा जल हो जाती है। जब इसे वापस नर्मदा में डाल दिया जाता है तो वह पुनः नर्मदा हो जाती है। वेगड जी भी नर्मदा किनारे चलकर इसके छोटे छोटे टुकडों को अपनी कलम से संजोकर नर्मदा जल रहे। अब जब नर्मदा में उनके अवशेष बहाए जाएंगे तब नर्मदा का यह चिर यात्री, नर्मदा का सच्चा यायावार, नर्मदा का संवाददाता और नर्मदा को अमृतस्य नर्मदा का दर्जा देने वाला यह चितेरा, लेखक, कवि नर्मदा में सदा के लिए समा जाएगा। वेगड जी की देह इस संसार से दूर जा रही है लेकिन नर्मदा के जल से भरी हर अंजुरि मे, नर्मदा में क्रीडा करते लोगों में, इसके वन, इसके झरने, इसमें मिलने वाली सहायक नदियों में और इसके बहते पानी में हम हमेशा वेगड जी की महक महसूस होगी।

अपने अंतिम दिन को लेकर वेगड जी ने लिखा था कि जब उनका अंतिम दिन आएगा तब नर्मदा तट की हवाओं तुम मुझे कंधा देना। नर्मदा तट के पक्षीगण तुम उत्फुल्ल कंठ से अपने गीतों की तान छेडना। नर्मदा तट के अर्जुन वृक्ष तुम मेरी चिता सजाना। दोपहर की चिलचिलाती धूप तुम चिता को अग्नि देना। नर्मदा की चट्टानों चिता जब तक जल न जाए तब तक तुम वहीं रहा। नर्मदा की लहरों अस्त हो रहे सूर्य की सिंदूरी आभा तुम्हारे उपर पडने लगे तब तुम मेरी अस्थियों को नर्मदा में प्रवाहित कर देना और मां नर्मदे तू हमेशा के लिए मुझे अपनी गोद में ले लेना।

उनकी दूसरी इच्छा यह थी कि कयामत के दिन जब पुकार हो तो मेरी पुकार इस तरह से हो- कहां गया वो नर्मदा सौंदर्य वाला।

वेगड जी कहते थे जो परिक्रमा उन्होंने की  वह नर्मदा परिक्रमा की इंटर्नशिप थी। परिक्रमा तो अगले जनम करूंगा। हो सकता है तब परिक्रमा के योग्य बन जाउं। हमे भी इंतजार रहेगा कि कयामत के दिन आपका पुकारा हो कहां है नर्मदा सौंदर्य वाला और आप हाथ उठाकर लकडी थामकर कहे, आया और फिर चल दे नर्मदा की यात्रा पर। अपनी नर्मदा के साथ।

अपनी यात्राओं को लेकर वेगड जी ने कहा था कि मै तुम्हारे तट पर आता था, कई कई दिन चलता था। फिर वापस आ जाता था। लेकिन एक बार ऐसा आउंगा कि वापस नहीं जाउंगा, हमेशा के लिए मीठी नींद सो जाउंगा। तब थपकी देकर सुला देना। बस यही एक आकांक्षा है इसे पूरी करना मां।

उम्मीद है अपने इस पुत्र की चाह मां नर्मदा जरूर पूरी करेगी।

ॐ शांती

प्रशांत शैलके

 

Shri Amrit Lal Vegad ji went to sleep in the lap of Narmada mother

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