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आपतकाल हिंदुस्तान का वो काला अध्याय जिसे हम न भूले हैं, न भूलने देंगे

Publish Date: | Thu, 25 Jun 2020 04:14 AM (IST)

आपातकाल की वर्षगांठ पर मीसाबंदियों ने सुनाए पुराने संस्मरण

नोट दीनदयाल मोहने, कैलाश सोनी के नाम से फोटो है।

छिंदवाड़ा। 25 जून 1975 आजाद भारत का वो काला अध्याय है, जिसे लोग कभी नहीं भूल सकते। इमरजेंसी के उस दौर को लेकर मीसाबंदियों से जब बात की तो उन्होंने कहा कि इस काला अध्याय को न हम भूले हैं और न लोगों को भूलने देंगे। कुर्सी खाली करो कि जनता आती है के नारे के साथ पूरे देश में आंदोलन शुरू हुए थे। छिंदवाड़ा में इस दौरान बड़े पैमोने पर लोगों की गिरफ्तारियां की गई थी। जिसमें सौंसर के अन्नाा गार्गें घनश्याम, नारायण पोफली, बालमुकुंद गुप्ता, मधुकर राव पहाड़े, दीनदयाल मोहने, अजय औरंगाबादकर, सुंदर सिंह शक्रवार, रूपचंद राय, पुरुषोत्तम पवार जैसे नाम शामिल हैं।

देश की आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी। दीनदयाल मोहने

लोकतंत्र सेनानी संघ के दीनदयाल मोहने ने बताया कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध अपना फैसला सुनाया, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया गया। इंदिरा गांधी ने कोर्ट का फैसला नहीं माना और पद से त्याग पत्र नहीं दिया। जिसके बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कुर्सी खाली करो, जनता आती है के नारे के साथ देश भर में आंदोलन चलाया गया और जब तक पूर्व प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं दे देती, तब तक आंदोलन जारी रखने का फैसला किया गया। आज लोग जब भी ये बात करते हैं कि इमरजेंसी जैसे हालात हैं, तो मैं बता दूं कि इमरजेंसी का अनुभव संविधान विरोधी रहा है। कभी भारत में आंतरिक आपातकाल की स्थिति न बने, बस यही कामना है। हम इमरजेंसी के उस दौर को कभी नहीं भूल सकते और न ही लोगों को भूलने देंगे।

पता नहीं था कब जेल से बाहर निकलेंगे । कैलाश सोनी

राज्यसभा सांसद और जिले के प्रभारी सांसद कैलाश सोनी ने बताया कि उस दौर को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। बिना किसी कसूर के लोगों को सीधे जेल में डाल दिया गया। मुझे 26 जून को गिरफ्तार किया गया, 21 महीने तक जेल में रहना पड़ा। सिर्फ दो दिन की पैरोल मिली। उस दौर में युवा संघर्ष वाहिनी के सहसंयोजक रहते हुए जयप्रकाश नारायण की जबलपुर, ग्वालियर और इंदौर में सभाएं करवाई। जेल में दूसरे कैदियों के साथ रखा गया। बाकी कैदियों को पता होता था कि उनकी रिहाई कब होगी, लेकिन हमारी रिहाई कब होगी, होगी भी या नहीं ये तय नहीं था। जब नई सरकार बनी तब कहीं जाकर रिहा हुए। जेल में रहने के दौरान जब चुनाव की घोषणा हुई तो कई लोगों का मत था कि चुनाव नहीं लड़ना चाहिए, लेकिन वो चुनाव जनता ने ही लड़ा और लोकतंत्र की जीत हुई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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